वेल्लोर यात्रा वृतांत: लोकतंत्र की परछाई, दो दुनिया की अर्थव्यवस्था और इतिहास की अनसुनी आवाज

Anand Kumar
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आनंद कुमार

तमिलनाडु के ऐतिहासिक शहर वेल्लोर में इस बार पहुंचना महज एक निजी काम के सिलसिले में हुआ, लेकिन यह यात्रा धीरे-धीरे एक गहरे अनुभव में बदल गई। वेल्लोर उन शहरों में है जो पहली नजर में साधारण लगते हैं, लेकिन थोड़ा ठहर कर देखने पर अपनी परतें खोलते हैं। यहां कुछ दिन बिताने के बाद यह एहसास हुआ कि यह शहर केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और इतिहास का एक जीवंत संगम है।

चुनाव की जमीन की सच्चाई और लोकतंत्र का दूसरा चेहरा

जहां मैं ठहरा था, वहां काम करने वाली एक महिला से बातचीत के दौरान चुनाव की चर्चा छिड़ गई। उन्होंने सहजता से बताया कि हालिया मतदान, जो 23 अप्रैल को हुआ, उसमें हर वोटर को वोट के बदले पैसे दिए जा रहे थे। उनके अनुसार द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के उम्मीदवार की तरफ से एक वोट के लिए करीब दो हजार रुपये तक दिए जाने की चर्चा थी, जबकि विरोधी पक्ष लगभग एक हजार रुपये दे रहा था। जिस सहजता से उसने यह बात कही, उसने लोकतंत्र के जमीनी स्वरूप पर सवाल खड़े कर दिए। दिलचस्प यह रहा कि तमिल सुपरस्टार थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम को युवाओं का समर्थन मिल रहा है, जबकि उसके उम्मीदवारों ने पैसे बांटने की होड़ में हिस्सा नहीं लिया। यह संकेत है कि बदलाव की इच्छा मौजूद है, भले ही वह अभी पूरी तरह स्पष्ट न हो।

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भाषा का आग्रह और अर्थव्यवस्था

अक्सर दक्षिण भारत को लेकर यह धारणा बनाई जाती है कि हिंदी वहां नहीं समझी जाती, लेकिन वेल्लोर कहीं इस मिथक को तोड़ता और कहीं इसके साथ चलता दीखता है। खासकर अस्पताल क्षेत्र में हिंदी एक सामान्य संवाद की भाषा के रूप में सामने आती है। यहां बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश से आए लोग बड़ी संख्या में मिलते हैं और स्थानीय लोग भी उनसे संवाद करने के लिए हिंदी समझते हैं। यह एक ऐसा सांस्कृतिक पुल है जो इस शहर को और सहज बनाता है।

अर्थव्यवस्था की दो दुनिया: सीएमसी और वीआईटी का प्रभाव

वेल्लोर की असली तस्वीर तब सामने आती है जब आप इसकी अर्थव्यवस्था को देखते हैं। यह शहर लगभग दो अलग-अलग आर्थिक ढांचों पर खड़ा है। क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर के आसपास का इलाका जीवन से भरा हुआ है, लेकिन यह जीवन संघर्ष और जरूरतों से संचालित है। यहां देशभर से मरीज आते हैं और उनके साथ एक पूरा सामाजिक तंत्र विकसित हो चुका है। सस्ते होटल, छोटे लॉज, किफायती भोजनालय, इडली-दोसा से लेकर उत्तर भारतीय खाने तक सब उपलब्ध है। बंगाली, मुस्लिम और हिंदू भोजन के अलग-अलग केंद्र यहां मिलते हैं। यह इलाका एक तरह से “भारत का लघु रूप” लगता है, जहां हर वर्ग का आदमी अपनी जरूरत के हिसाब से जीवन जी रहा है।

वेल्लोर
वेल्लोर

इसके बिल्कुल उलट वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के आसपास का इलाका एक अलग ही कहानी कहता है। यहां आधुनिकता, सुविधा और खर्च करने की क्षमता साफ दिखाई देती है। ब्रांडेड स्टोर, कॉफी शॉप, मॉल, फास्ट फूड चेन जैसे मैकडोनाल्ड, महंगे आइसक्रीम पार्लर, गेमिंग जोन और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाएं इस क्षेत्र को एक ग्लोबल कैंपस का रूप देती हैं। उत्तर भारत के छात्रों की बड़ी संख्या यहां दिखती है और यह इलाका पूरी तरह एक “कंज्यूमर इकॉनमी” पर आधारित नजर आता है। और यहां भाषा एक तरह की बाधा बनती है। खासकर ऑटो और टैक्सीवाले हिंदी नहीं समझने की बात कह देते हैं। शायद ऐसा वे भाड़े को लेकर मोलतोल से बचने के लिए करते हैं। लेकिन टूटी-फूटी अंग्रेजी, हिंदी और इशारों की भाषा से काम चल गया। कोई खास दिक्कत नहीं हुई।

वेल्लोर किला: इतिहास की वह चिंगारी जो किताबों में कम है

काम के बीच समय निकालकर मैंने वेल्लोर किला देखा। यह किला ग्रेनाइट पत्थरों से बना एक मजबूत दुर्ग है, जो चारों तरफ पानी से घिरी खाई से सुरक्षित है। बाहर से यह किला जितना भव्य दिखता है, भीतर उसका इतिहास उतना ही उथल-पुथल भरा है। वेल्लोर किला दक्षिण भारत के सबसे मजबूत और ऐतिहासिक किलों में गिना जाता है। इसका निर्माण 16वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के अधीन नायक शासकों, विशेष रूप से चिन्ना बोम्मी नायक और तिम्मा रेड्डी नायक द्वारा कराया गया था। ग्रेनाइट पत्थरों से बना यह किला चारों ओर गहरी खाई से घिरा हुआ है, जो इसकी सुरक्षा व्यवस्था को दर्शाता है।

समय के साथ यह किला कई शासकों के अधीन रहा। विजयनगर के पतन के बाद इस पर बीजापुर सल्तनत, फिर मराठों और बाद में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान का अधिकार रहा। 1799 में श्रीरंगपट्टनम युद्ध के बाद अंग्रेजों ने इस किले पर कब्जा कर लिया और टीपू सुल्तान के परिवार को यहीं नजरबंद रखा गया।

वेल्लोर

हम अक्सर 1857 के विद्रोह को पहला स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं, लेकिन वेल्लोर किला इस धारणा को चुनौती देता है। यहां 10 जुलाई 1806 को भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ एक बड़ा और हिंसक विद्रोह किया था। इस विद्रोह की जड़ें सैन्य नियमों में बदलाव में थीं। मद्रास सेना के कमांडर इन चीफ सर जॉन क्रैडॉक द्वारा लागू किए गए नए ड्रेस कोड और धार्मिक हस्तक्षेप की आशंका ने सिपाहियों में असंतोष पैदा किया।

विद्रोह के दौरान लगभग 14 अंग्रेज अधिकारी और 100 से अधिक यूरोपीय सैनिक मारे गए। विद्रोहियों ने टीपू सुल्तान के बेटे फतेह हैदर को राजा घोषित कर किले पर मैसूर का झंडा फहरा दिया। उस समय टीपू सुल्तान का परिवार यहीं नजरबंद था। हालांकि यह विद्रोह ज्यादा समय तक नहीं टिक सका। आर्कॉट से आए कर्नल गिलेस्पी ने इसे कुचल दिया और करीब 800 भारतीय सैनिक मारे गए। कई सिपाहियों को तोप से उड़ा दिया गया। यह घटना बताती है कि आजादी की लड़ाई की चिंगारी 1857 से बहुत पहले ही जल चुकी थी। किले के भीतर मंदिर, मस्जिद और चर्च तीनों मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सह अस्तित्व का प्रमाण हैं। आज यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है, हालांकि कुछ हिस्सों में सरकारी दफ्तर भी चलते हैं।

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जलगंडेश्वर मंदिर: पत्थरों में जीवित शिल्पकला

किले के भीतर स्थित जलगंडेश्वर मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि विजयनगर स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है। 16वीं सदी में बने इस मंदिर का नाम ही इसकी विशेषता को दर्शाता है। जलगंडेश्वर का अर्थ है पानी में स्थित भगवान। यह मंदिर किले की खाई के स्तर से नीचे स्थित है और माना जाता है कि इसके गर्भगृह के नीचे जल स्रोत है। मंदिर का कल्याण मंडपम अपनी नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। पत्थर के खंभों पर उकेरे गए शेर, घोड़े, योद्धा और पौराणिक आकृतियां इतनी जीवंत हैं कि यह स्थान एक खुला कला संग्रहालय प्रतीत होता है। इतिहास के उतार-चढ़ाव के कारण यहां लंबे समय तक पूजा बंद रही और लगभग चार सौ वर्षों के बाद 1981 में फिर से पूजा शुरू हुई। यह मंदिर इतिहास, संघर्ष और पुनर्जागरण का प्रतीक है।

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किले का संग्रहालय: इतिहास के जीवित दस्तावेज

किले के भीतर एक संग्रहालय है। जो इस पूरे परिसर को और भी अर्थपूर्ण बना देता है। यह संग्रहालय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन संचालित होता है और यहां रखी गई वस्तुएं वेल्लोर और आसपास के क्षेत्रों के लंबे इतिहास की कहानी कहती हैं। यहां प्राचीन हथियार, तलवारें, बंदूकें, तोपों के हिस्से, पुराने सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख संरक्षित किए गए हैं। इन अवशेषों के माध्यम से विजयनगर काल, मराठा शासन, मैसूर सल्तनत और ब्रिटिश काल की झलक एक साथ देखने को मिलती है। संग्रहालय का हर कक्ष एक अलग समयखंड को सामने लाता है, जिससे यह महसूस होता है कि यह किला केवल एक संरचना नहीं, बल्कि कई युगों का साक्षी रहा है।

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श्रीपुरम गोल्डन टेंपल: आस्था और भव्यता का नया आयाम

वेल्लोर की यात्रा श्रीपुरम स्थित महालक्ष्मी गोल्डन टेंपल के बिना अधूरी मानी जाती है। यह मंदिर अपनी स्वर्ण परत के कारण विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है। यहां जाना एक अद्भुत अनुभव है। पूरा मंदिर परिसर सोने की परत से ढका हुआ है और यहां तक पहुंचने के लिए एक विशेष तारा आकार का मार्ग बनाया गया है। श्रद्धालु इस मार्ग से गुजरते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं, जो आध्यात्मिक अनुभव को और गहरा करता है। यह मंदिर आधुनिक समय में निर्मित होने के बावजूद आस्था और भव्यता का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है और हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

वेल्लोर एक अनुभव है, केवल शहर नहीं वेल्लोर की यह यात्रा केवल एक स्थान देखने तक सीमित नहीं रही। यह एक ऐसा अनुभव बना, जिसमें लोकतंत्र की जमीनी सच्चाई, अर्थव्यवस्था की दो अलग दुनिया और इतिहास की अनसुनी आवाज एक साथ सामने आई। यह शहर बताता है कि भारत को समझने के लिए बड़े महानगरों से ज्यादा जरूरी है ऐसे शहरों को समझना, जहां जीवन अपनी पूरी जटिलता के साथ चलता है। वेल्लोर चुपचाप बहुत कुछ कहता है, बस जरूरत है उसे ध्यान से देखने और समझने की।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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