Ranchi/Guwahati : असम विधानसभा चुनाव के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने प्रशासन और सत्ता पक्ष पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा डालने के गंभीर आरोप लगाए हैं। कल्पना सोरेन और हेमंत सोरेन दोनों नेताओं ने अलग-अलग घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें चुनावी सभाएं करने और जनता से मिलने से रोका गया।
कल्पना सोरेन ने आरोप लगाया कि खुमताई, नहरकटिया और मार्गेरीटा विधानसभा क्षेत्रों में उनके कार्यक्रम के लिए हेलीपैड की अनुमति नहीं दी गई, जिससे वे निर्धारित सभाओं में नहीं पहुंच सकीं। वहीं हेमंत सोरेन ने कहा कि उन्हें रोंगोनदी और चाबुआ विधानसभा क्षेत्रों में अपने समर्थकों से मिलने नहीं दिया गया।
“हेलीकॉप्टर रोका जा सकता है, आवाज नहीं”
कल्पना सोरेन ने कहा कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से उनकी आवाज को दबाने की कोशिश है। उन्होंने कहा, “आप रास्ता रोक सकते हैं, लेकिन जनआक्रोश नहीं रोक सकते। आप हेलीकॉप्टर रोक सकते हैं, लेकिन जनता के इरादे नहीं रोक सकते।”
उन्होंने सड़क मार्ग से जाते हुए फोन के जरिए खुमताई और नहरकटिया की जनता को संबोधित किया और अपील की कि 9 अप्रैल को “तीर-धनुष” के पक्ष में मतदान कर जवाब दें। उन्होंने चुनाव को “सम्मान, पहचान और अधिकार की लड़ाई” बताया।
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हेमंत सोरेन का आरोप: “संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग”
हेमंत सोरेन ने अपने बयान में कहा कि असम में लोकतंत्र की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल कर इस तरह के षड्यंत्र से “तीर-धनुष” की ताकत को रोका जा सकता है?
उन्होंने कहा कि चाय बागान के आदिवासी समाज को वर्षों से दबाने की कोशिश की जाती रही है, लेकिन अब यह समाज जाग चुका है और अपने अधिकार के लिए संघर्ष करेगा।

ST दर्जा बना बड़ा चुनावी मुद्दा
हेमंत सोरेन ने असम के चाय बागानों में रहने वाले आदिवासी समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा नहीं मिलने को “राष्ट्रीय स्तर का अन्याय” बताया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि न्याय, सम्मान और पहचान का सवाल है।
उन्होंने आरोप लगाया कि दशकों से सरकारें बदलती रहीं, लेकिन इस समुदाय को उसका संवैधानिक अधिकार नहीं मिला। “जब तक न्याय अधूरा है, तब तक लोकतंत्र भी अधूरा है,” उन्होंने कहा।
टिंगखोंग में सभा, वोट की अपील
टिंगखोंग विधानसभा क्षेत्र में जनसभा को संबोधित करते हुए हेमंत सोरेन ने झामुमो उम्मीदवार महावीर बास्के के लिए समर्थन मांगा। उन्होंने कहा कि इस बार असम का शोषित, वंचित और आदिवासी समाज एकजुट होकर अपने हक के लिए वोट करेगा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि विरोधी दल लोगों को डराने-धमकाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब यह रणनीति काम नहीं करेगी।
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“पीड़ित नैरेटिव” और “अधिकार की राजनीति” पर फोकस
असम में झामुमो का चुनावी अभियान दो स्पष्ट रणनीतियों पर आधारित नजर आ रहा है:
पीड़ित बनाम सत्ता का नैरेटिव
कल्पना और हेमंत सोरेन दोनों ने अपने बयानों में यह स्थापित करने की कोशिश की है कि उन्हें “रोकने” की कोशिश हो रही है।
– इससे कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भावनात्मक एकजुटता बढ़ती है
– चुनाव को “हम बनाम सत्ता” की लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है
आदिवासी अधिकार का केंद्रीय मुद्दा
ST दर्जे का मुद्दा उठाकर झामुमो ने सीधे चाय बागान के आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।
– यह मुद्दा ऐतिहासिक और भावनात्मक दोनों स्तर पर असर डालता है
– कांग्रेस और भाजपा दोनों पर एक साथ दबाव बनता है
वोट को “संघर्ष का जवाब” बनाना
“वोट की चोट” और “तीर-धनुष पहचान है” जैसे नारों के जरिए चुनाव को आंदोलन का रूप देने की रणनीति दिखती है।
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आगे क्या?
असम में झामुमो भले ही नई ताकत के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन यह रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि:
- क्या ये मुद्दे स्थानीय स्तर पर वोट में तब्दील होते हैं
- और क्या विपक्ष इन आरोपों का जवाब दे पाता है
फिलहाल इतना तय है कि झामुमो ने असम चुनाव को केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि “अधिकार बनाम सत्ता” की लड़ाई बनाने की कोशिश तेज कर दी है।