झारखंड राज्यसभा चुनाव 2026 : बाजी तय दिख रही पर हो सकता है ‘खेला’

Anand Kumar
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राज्यसभा चुनाव बनेगा गठबंधन की एकजुटता की सबसे बड़ी कसौटी

Political Analysis

राज्यसभा चुनाव| झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर प्रस्तावित चुनाव ने राजनीतिक हलकों में असामान्य हलचल पैदा कर दी है। पहली नजर में यह चुनाव सत्तारूढ़ महागठबंधन के लिए सहज दिखता है, लेकिन गहराई से देखने पर समीकरण उतने सरल नहीं हैं। संख्या बल की मजबूती के बावजूद आंतरिक खींचतान, क्षेत्रीय राजनीतिक संदेश और राष्ट्रीय स्तर के गठबंधन समीकरण इस चुनाव को दिलचस्प बना रहे हैं।

यह चुनाव केवल दो सीटों का नहीं, बल्कि झारखंड की सियासत में भरोसे, समन्वय और रणनीति की परीक्षा है।

दो सीटें, बदलते राजनीतिक संकेत

राज्यसभा की एक सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है, जबकि दूसरी सीट भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल जून 2026 में समाप्त होने से रिक्त हो रही है। इन दोनों सीटों पर मई-जून 2026 में चुनाव संभावित है।

झारखंड विधानसभा की कुल 81 सीटों के आधार पर राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 27+1 यानी 28 विधायकों का समर्थन आवश्यक है। यह गणित चुनाव को सीधे-सीधे संख्या के खेल में बदल देता है, लेकिन राजनीति केवल अंकगणित नहीं होती—यह रणनीति, संबंध और समय का भी खेल है।

आंकड़ों का गणित: सत्ताधारी पक्ष की बढ़त, लेकिन चुनौती बरकरार

वर्तमान विधानसभा में सत्तारूढ़ महागठबंधन (झामुमो-कांग्रेस-राजद-सीपीआई माले) के पास कुल 56 विधायक हैं—

  • झामुमो – 34
  • कांग्रेस – 16
  • राजद – 4
  • माले – 2

इसके मुकाबले विपक्षी एनडीए के पास 24 विधायक हैं—

  • भाजपा – 21
  • आजसू – 1
  • जदयू – 1
  • लोजपा (रामविलास) – 1

इसके अलावा एक विधायक जेएलकेएम के पास है।

स्पष्ट है कि 56 विधायकों के साथ महागठबंधन सैद्धांतिक रूप से दोनों सीटें जीत सकता है। लेकिन राजनीति के ‘अगर’ और ‘मगर’ यहीं से शुरू होते हैं।

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पहली सीट: लगभग तय, झामुमो की बढ़त

संख्या बल के आधार पर पहली सीट पर झामुमो की जीत लगभग निर्विवाद मानी जा रही है। यह सीट पार्टी के खाते में जाना तय समझा जा रहा है। इस जीत के बाद झामुमो के पास पहली प्राथमिकता के लगभग 6 वोट शेष बचेंगे, जो दूसरी सीट के समीकरण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

दूसरी सीट: असली सियासी संघर्ष

दूसरी सीट पर ही पूरा राजनीतिक संघर्ष केंद्रित है। यहां तीन स्तरों पर टकराव दिखाई देता है—

झामुमो बनाम कांग्रेस: दावेदारी की जंग

झामुमो दोनों सीटों पर दावा जता रहा है, जबकि कांग्रेस स्पष्ट कर चुकी है कि कम से कम एक सीट पर उसका अधिकार बनता है। कांग्रेस का तर्क है कि पूर्व के चुनावों में उसने कई बार त्याग किया है, अब झामुमो को सहयोग करना चाहिए।

यह टकराव केवल सीट का नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन का संकेत भी है।

राष्ट्रीय राजनीति का असर: असम और बिहार की गूंज

असम विधानसभा चुनाव में झामुमो द्वारा अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय कांग्रेस के साथ संबंधों में तनाव का कारण बना। दूसरी ओर बिहार में राजद द्वारा झामुमो को अपेक्षित महत्व नहीं दिए जाने से भी असंतोष उभरा है।

इन घटनाओं ने झारखंड के भीतर गठबंधन की आंतरिक केमिस्ट्री को प्रभावित किया है, जिसका असर राज्यसभा चुनाव में दिख सकता है।

भाजपा की रणनीति: संख्या कम, लेकिन उम्मीद कायम

विपक्षी दल भाजपा के पास केवल 24 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए उसे कम से कम 4 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी। यदि जेएलकेएम का समर्थन मिल भी जाए, तब भी 3 वोट की कमी बनी रहती है।

फिर भी भाजपा रणनीतिक रूप से आश्वस्त नजर आती है। पार्टी का मानना है कि यदि सत्तारूढ़ गठबंधन में असंतोष या बिखराव होता है, तो वह स्थिति का लाभ उठा सकती है।

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस विषय पर स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है, लेकिन संकेत दिए हैं कि समय आने पर पार्टी रणनीतिक निर्णय लेगी।

संभावित परिदृश्य: तीन रास्ते, तीन परिणाम

परिदृश्य 1 : गठबंधन एकजुट

यदि झामुमो, कांग्रेस, राजद और माले एकजुट रहते हैं, तो दोनों सीटों पर उनकी जीत लगभग तय है।

परिदृश्य 2 : आंतरिक टकराव

यदि झामुमो और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं बनती, तो दूसरी सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जिससे भाजपा को अवसर मिलेगा।

परिदृश्य 3 : ‘बिहार मॉडल’

यदि क्रॉस वोटिंग या रणनीतिक अनुपस्थिति होती है, तो बिहार राज्यसभा चुनाव जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहां कम संख्या के बावजूद भाजपा ने जीत दर्ज की थी।

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संख्या बनाम रणनीति की असली परीक्षा

झारखंड का राज्यसभा चुनाव 2026 केवल गणितीय समीकरण का मामला नहीं है। यह चुनाव तय करेगा कि –

  • क्या महागठबंधन अपनी एकजुटता बनाए रख पाता है
  • क्या कांग्रेस और झामुमो के बीच शक्ति संतुलन कायम रहता है
  • और क्या भाजपा सीमित संख्या के बावजूद रणनीति से बाजी पलट सकती है

आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा, राजनीतिक बयानबाजी और गठबंधन के भीतर की बातचीत इस चुनाव की दिशा तय करेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह चुनाव ‘आसान जीत’ से कहीं अधिक जटिल और रोमांचक होने जा रहा है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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