पोते-पोतियों की देखभाल से बुजुर्गों का दिमाग रहता है तेज, याददाश्त और भाषा कौशल में सुधार: शोध

Anand Kumar
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साइकोलॉजी एंड एजिंग जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में सामने आया कि पारिवारिक भूमिका में सक्रिय बुजुर्गों की मानसिक क्षमताएं अधिक मजबूत रहती हैं

New Delhi : अपने नाती-पोतों या पोते-पोतियों की देखभाल को अब तक केवल पारिवारिक जिम्मेदारी या भावनात्मक जुड़ाव से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन ने इसके मानसिक लाभों को भी उजागर किया है। शोध में पाया गया है कि जो बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों की देखभाल करते हैं, उनकी याददाश्त और भाषा से जुड़ी क्षमताएं उन बुजुर्गों की तुलना में बेहतर होती हैं, जो इस भूमिका में सक्रिय नहीं रहते।

प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुआ अध्ययन

यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल साइकोलॉजी एंड एजिंग में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका फ्लाविया चेरेचेश हैं। शोध में 50 वर्ष से अधिक आयु के 2,887 दादा-दादी (नाना-नानी) को शामिल किया गया, जिनकी औसत आयु लगभग 67 वर्ष थी।इन प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण 2016 से 2022 के बीच किया गया। इस दौरान उनकी मेमोरी, शब्द प्रयोग और भाषा कौशल से जुड़े विभिन्न मानसिक परीक्षण किए गए।

देखभाल करने वाले बुजुर्गों का प्रदर्शन बेहतर

शोध के नतीजों के अनुसार, जो बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों की देखभाल कर रहे थे, उन्होंने मेमोरी और वर्बल स्किल्स से जुड़े परीक्षणों में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया।दिलचस्प बात यह रही कि यह सकारात्मक प्रभाव इस बात पर निर्भर नहीं करता था कि बुजुर्ग कितनी बार या किस प्रकार की देखभाल करते हैं। चाहे देखभाल नियमित हो या कभी-कभार, और चाहे वह पढ़ाने, खेलने या सामान्य निगरानी तक सीमित हो- मानसिक लाभ लगभग समान पाए गए।

सक्रिय भूमिका निभाना है सबसे अहम

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस पूरे प्रभाव का सबसे महत्वपूर्ण कारण है सक्रिय भागीदारी। बच्चों के साथ समय बिताने से बुजुर्गों का सामाजिक संपर्क बढ़ता है और उनका दिमाग लगातार सक्रिय रहता है।बच्चों की जरूरतों को समझना, उनसे बातचीत करना, सवालों के जवाब देना और उनके साथ गतिविधियों में शामिल होना—ये सभी प्रक्रियाएं दिमाग को लगातार चुनौती देती हैं, जिससे सोचने-समझने की क्षमता बनी रहती है।

मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद

अध्ययन में यह भी सामने आया कि बच्चों के साथ जुड़ाव बुजुर्गों के जीवन में उद्देश्य और जिम्मेदारी का भाव पैदा करता है। यह भावनात्मक संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद अहम माना जाता है।शोध यह संकेत देता है कि भले ही बढ़ती उम्र में मानसिक गिरावट को पूरी तरह रोका न जा सके, लेकिन जीवनशैली और सामाजिक भूमिका इसमें बड़ा फर्क डाल सकती हैं।

परिवार से जुड़ाव, दिमाग के लिए संजीवनी

निष्कर्ष के तौर पर शोध में कहा गया है कि परिवार के भीतर सक्रिय रहना, खासकर अगली पीढ़ी की देखभाल में भागीदारी, बुजुर्गों को न केवल भावनात्मक संतोष देती है बल्कि उनके दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ और सक्रिय रखने में भी मदद करती है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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