झारखंड में हाई-प्रोफाइल हत्याओं ने पुलिस जांच प्रणाली पर फिर खड़े किए सवाल

Khunti : खूंटी के पड़हा राजा और आदिवासी नेता सोमा मुंडा की हत्या की गुत्थी सुलझने के साथ ही झारखंड की कानून-व्यवस्था और पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस हत्याकांड में गिरफ्तार आरोपियों में देवव्रत नाथ शाहदेव का नाम सामने आने के बाद, पिछले वर्ष रांची में हुए भाजपा नेता और समाजसेवी अनिल महतो उर्फ अनिल टाइगर हत्याकांड की यादें ताजा हो गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि अगर रांची पुलिस ने समय रहते देवव्रत नाथ शाहदेव पर प्रभावी कार्रवाई की होती, तो संभव है कि सोमा मुंडा की हत्या जैसी घटना को रोका जा सकता था।
अनिल टाइगर हत्याकांड : जांच से ज्यादा नैरेटिव पर जोर?
रांची में पिछले वर्ष अनिल टाइगर की हत्या के बाद शुरुआती दौर में पुलिस जांच की दिशा को लेकर ही सवाल उठने लगे थे। आरोप है कि रांची पुलिस ने हत्या की निष्पक्ष जांच करने के बजाय, पहले अनिल टाइगर के आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े होने का एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इससे मामला भटकता चला गया।
लंबे अनुसंधान के बाद पुलिस ने देवव्रत नाथ शाहदेव को इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड बताया, लेकिन आरोप तय करने और ठोस साक्ष्य अदालत के समक्ष रखने में पुलिस विफल रही। नतीजतन, देवव्रत को कोर्ट से जमानत मिल गई और वह जेल तक नहीं गया।
सोमा मुंडा हत्याकांड में फिर सामने आया वही नाम
7 जनवरी 2026 को खूंटी में आदिवासी नेता और पड़हा राजा सोमा मुंडा की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस हत्या ने पूरे आदिवासी समाज को झकझोर दिया और जिला बंद से लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन तक हुए।
अब SIT की जांच में सामने आया है कि इस हत्याकांड में देवव्रत नाथ शाहदेव की भूमिका भी है और उसे गिरफ्तार किया गया है। यही वह मोड़ है, जहां पुलिस की पूर्व कार्रवाई (या निष्क्रियता) पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।
क्या पहले शिकंजा कसता तो बच सकती थी जान?
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि अगर अनिल टाइगर हत्याकांड में रांची पुलिस ने देवव्रत नाथ शाहदेव के खिलाफ मजबूत केस तैयार किया होता, उसे जेल भेजा गया होता या उसकी गतिविधियों पर सख्त निगरानी रखी गई होती, तो क्या सोमा मुंडा की हत्या रोकी जा सकती थी?
यह सवाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच एजेंसियों के लिए आत्ममंथन का विषय है। दो हाई-प्रोफाइल हत्याओं में एक ही नाम का सामने आना महज संयोग है या पुलिस की रणनीतिक चूक, यह जांच का विषय है।
जमीन विवाद में हुई थी हत्या, सात आरोपी गिरफ्तार
पड़हा राजा सोमा मुंडा हत्याकांड की गुत्थी अंततः सुलझ गई है। झारखंड पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने इस मामले में बड़ी सफलता हासिल करते हुए सात आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। यह हत्याकांड न केवल खूंटी जिले में सनसनी फैला चुका था, बल्कि पूरे आदिवासी समाज में गहरा आक्रोश और बेचैनी पैदा कर दी थी। पुलिस का खुलासा है कि हत्या किसी अचानक विवाद का नतीजा नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे जमीन विवाद को लेकर रची गई सुनियोजित साजिश थी।हत्या की घटना 7 जनवरी 2026 को खूंटी थाना क्षेत्र के जमुवादाग गांव के निकट तालाब के पास हुई थी, जहां अपराधियों ने सोमा मुंडा को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।
गिरफ्तार आरोपियों ने पूछताछ में अपनी भूमिका कबूल कर ली है। जांच में सामने आया कि सोमा मुंडा का कुछ लोगों से जमीन को लेकर पुरानी रंजिश चल रही थी, जो समय के साथ और गहराती गयी। इसी रंजिश के चलते आरोपियों ने मिलकर हत्या की योजना बनाई और मौके की तलाश में थे।गिरफ्तार सात आरोपियों में ज्यादातर खूंटी जिले के निवासी हैं, जबकि एक रांची से जुड़ा हुआ है।
इनके पास से कई मोबाइल फोन बरामद हुए हैं, जिनकी फॉरेंसिक जांच चल रही है। कुछ आरोपियों का आपराधिक इतिहास भी सामने आया है। हालांकि, हत्या को अंजाम देने वाले मुख्य शूटर अभी फरार हैं। पुलिस ने उनकी पहचान कर ली है और संभावित ठिकानों पर छापेमारी तेज कर दी है। पुलिस का दावा है कि जल्द ही फरार आरोपियों को भी दबोच लिया जाएगा और पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश होगा।
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