
श्रीनिवास
कांग्रेस के दामन पर लगे अनेक काले धब्बों में एक लेखक- कवि- पत्रकार, रंगकर्मी और समाजकर्मी सफ़दर हाशमी की भीड़ हिंसा में हुई मौत (जो हत्या ही थी) भी है। कांग्रेस संगठन ने बाकायदा योजना बना कर उस घटना को अंजाम दिया था, यह तो नहीं कहा जा सकता, मगर उन पर हमला करने वाले कांग्रेसी गुंडे थे, यह तय है। शासन कांग्रेस का था; राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और हत्या राजधानी दिल्ली से कुछ दूर साहिबाबाद (उप्र) में हुई थी, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पड़ता है।
एक जनवरी 1989 को नुक्कड़ नाटक करते हुए सफ़दर हाशमी पर गुंडों ने हमला किया। माना जाता है कि गुंडे कांग्रेस के थे। उस घटना के 14 साल बाद गाजियाबाद की एक अदालत ने 10 लोगों को हत्या के मामले में आरोपी करार दिया, उनमें कांग्रेस के सदस्य ‘मुकेश शर्मा’ का भी नाम शामिल था।
Politics : रघुवर दास और झारखंड भाजपा : वापसी की उम्मीद या मार्गदर्शक मंडल की पटकथा?
उस हमले में बुरी तरह जख्मी सफ़दर की अगले दिन दो जनवरी को मौत हो गयी। मुझे लगता है, सफ़दर आज जिंदा होते तो दूसरे ब्रांड के गुंडे उनकी हत्या कर देते। इसलिए भी कि उन्होंने एक और ‘अक्षम्य’ अपराध किया था- ‘लव जिहाद’; साथी रंगकर्मी मल्यश्री से विवाह। सफ़दर जिस किस्म का लेखन, राजनीति और नाटक करते थे, वह तब भी सत्ता प्रतिष्ठान को चुभता था; आज और भी ज्यादा। अब तो राजधानी में उस तरह के नुक्कड़ नाटक करने की अनुमति भी शायद ही मिले। ऊपर से उनका नाम- सफ़दर- भी अपने आप में आज की सत्ताधारी जमात के लिए उनके ‘दुश्मन’ होने का ‘प्रमाण’ है। वैसे भी जिसे देश का विकास न दिखता हो और जो ‘पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो, पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो… क ख ग घ को पहचानो/ अलिफ़ को पढ़ना सीखो/ अ आ इ ई को हथियार/ बना कर लड़ना सीखो…’ जैसी कविताएं लिखता हो, उस पर जनता को विद्रोह के लिए उकसाने का आरोप लग ही सकता है!
यह भी याद किया जाये कि सफ़दर हाशमी की मौत के दो दिन बाद 4 जनवरी 1989 को मल्यश्री हाशमी, ‘जनम’ की टोली के साथ उस स्थान पर वापिस लौटीं और अधूरे छूट गये नाटक को खत्म किया था।
वंचितों की आवाज सफ़दर हाशमी को सलाम। सफ़दर जिंदा है- जब तक समाज में विवेक जिंदा है, सम्मान और बराबरी से जीने की लालसा जिंदा है, सफ़दर को जिंदा रहना और हमें उसे जिंदा रखना होगा।
Disclaimer : यह लेखक के अपने विचार हैं।