दास Politics में लगातार सक्रिय तो हैं लेकिन वापसी की संभावनाओं में पार्टी के नेता ही बन रहे हैं बाधा

आनंद कुमार
झारखंड की राजनीति (Politics) में रघुवर दास एक ऐसा नाम है, जो सत्ता, संगठन और विवाद – तीनों का पर्याय रहा है। वे राज्य के एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने पूर्ण बहुमत के साथ लगातार पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद वे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने और ओडिशा के राज्यपाल के रूप में भी उनकी नियुक्ति हुई। इसके बावजूद आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रघुवर दास का राजनीतिक भविष्य अभी भी सक्रिय राजनीति में है, या भारतीय जनता पार्टी उन्हें धीरे-धीरे हाशिये पर ले जा रही है।
हालिया घटनाक्रम इस प्रश्न को और जटिल बनाता है। झारखंड विधानसभा चुनावों में उन्हें कोई निर्णायक भूमिका नहीं दी गई। सिवाय इसके कि उनके बजाय उनकी बहू को उनकी सीट से भाजपा का टिकट दे दिया गया। बिहार जैसे अहम चुनावी राज्य में भी उन्हें स्टार प्रचारकों की सूची से बाहर रखा गया। उनकी पारंपरिक विधानसभा सीट की राजनीतिक विरासत अब उनकी बहू पूर्णिमा दास को सौंप दी गई है। यह सब संकेत करता है कि पार्टी में उनकी भूमिका को लेकर स्पष्टता नहीं है।
हालांकि, रघुवर दास की राजनीतिक निष्क्रियता का निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी। पेसा (PESA) कानून की नियमावली पर उन्होंने मुखर होकर हेमंत सोरेन सरकार को घेरा। जब राज्य कैबिनेट ने नियमावली को मंजूरी दी, तो उनके समर्थक गुट ने इसे रघुवर दास के दबाव का परिणाम बताया। इससे यह संदेश गया कि वे अब भी राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
रघुवर दास का राजनीतिक सफर भाजपा के पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे का उदाहरण रहा है। जमशेदपुर पूर्वी से लगातार जीत, 2014 में मोदी लहर के बीच पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभालना और सरकार व संगठन को सख्त अनुशासन में चलाना – इन सबने उन्हें एक “टफ टास्कमास्टर” की छवि दी। विकास कार्यों के साथ-साथ उन्हें आदिवासी मुद्दों और प्रशासनिक कठोरता को लेकर आलोचना भी झेलनी पड़ी। 2019 की चुनावी हार के बाद भी वे राष्ट्रीय राजनीति में बनाए रखे गए, जो उनके कद को दर्शाता है।
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इसके बावजूद पार्टी के भीतर स्थितियां उनके लिए सहज नहीं दिखतीं। जिन नेताओं को उन्होंने अपने कार्यकाल में आगे बढ़ाया, वही आज पार्टी की “सेकंड लाइन” के रूप में उभरे हैं और कथित तौर पर दिल्ली नेतृत्व को यह संदेश दे रहे हैं कि रघुवर दास की सक्रिय भूमिका संगठन के लिए असहज हो सकती है। रघुवर के दौर में उभरे कई नेता आज निर्णयात्मक पदों पर हैं और स्वाभाविक है कि वे किसी मजबूत केंद्रीय चेहरे की वापसी को अपने लिए चुनौती मानें।
इस पूरी तस्वीर में बाबूलाल मरांडी का फैक्टर भी अहम है। एक समय रघुवर दास की मौजूदगी में असहज माने जाने वाले मरांडी आज प्रदेश अध्यक्ष हैं, लेकिन संगठनात्मक प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा। उपचुनावों से लेकर लोकसभा और विधानसभा चुनावों तक भाजपा को झारखंड में लगातार नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि यदि नेतृत्व परिवर्तन की नौबत आती है, तो क्या मरांडी गुट रघुवर दास की वापसी स्वीकार करेगा।
भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती आदिवासी जनाधार का क्षरण है। अनुसूचित जनजाति सीटों पर लगातार हार ने पार्टी को रणनीतिक रूप से कमजोर किया है। ऐसे में पार्टी यह भी विचार कर सकती है कि भविष्य तीसरी कतार के नेताओं में तलाशा जाए या केंद्रीय नेतृत्व सीधे हस्तक्षेप करे। यह भी अटकलें हैं कि केंद्रीय नेतृत्व राज्य में किसी अप्रत्याशित चेहरे को आगे कर सकता है।
राजनीतिक गलियारों में खरमास के बाद बड़े फेरबदल की चर्चा है। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा झारखंड में या तो नेतृत्व परिवर्तन करेगी या फिर किसी बड़े राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ सकती है। ऐसे कयास भी हैं कि यदि पार्टी सत्ता के समीकरणों को प्राथमिकता देती है, तो धारदार राज्य नेतृत्व की भूमिका सीमित हो सकती है।
इन तमाम अटकलों के बीच रघुवर दास की रणनीति उल्लेखनीय है। उन्होंने कभी खुले विद्रोह का रास्ता नहीं चुना। न ही उन्होंने पार्टी के खिलाफ सार्वजनिक असंतोष जताया। उनकी सक्रियता, बयान और समर्थक गुट की हलचल यह संकेत देती है कि वे अभी खेल से बाहर नहीं हुए हैं। लेकिन सेकंड लाइन का दबाव, आंतरिक गुटबाज़ी और केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताएं उनके सामने बड़ी चुनौतियां हैं।
अंततः, रघुवर दास का भविष्य केवल एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं है। यह झारखंड में भाजपा की दिशा, नेतृत्व संकट और संगठनात्मक रणनीति का आईना है। क्या पार्टी एक आज़माए हुए नेता की ओर लौटेगी, या नए प्रयोग करेगी – यह फैसला रांची में होगा या दिल्ली में, यह आने वाला समय बताएगा।
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